Mantra Kahani Premchand | मंत्र – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

August 04, 2020

संध्या का समय था। डाक्टर चड्ढा गोल्फ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे। मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखायी दिये। डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था। डोली औषाधालय के सामने आकर रूक गयी। बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक से झॉँका। ऐसी साफ-सुथरी जमीन पर पैर रखते हुए भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे। डाक्टर साहब को खड़े देख कर भी उसे कुछ कहने का साहस न हुआ।
डाक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरज कर कहा—कौन है? क्या चाहता है?
डाक्टर साहब ने हाथ जोड़कर कहा— हुजूर बड़ा गरीब आदमी हूँ। मेरा लड़का कई दिन से…….

डाक्टर साहब ने सिगार जला कर कहा—कल सबेरे आओ, कल सबेरे, हम इस वक्त मरीजों को नहीं देखते।
बूढ़े ने घुटने टेक कर जमीन पर सिर रख दिया और बोला—दुहाई है सरकार की, लड़का मर जायगा! हुजूर, चार दिन से ऑंखें नहीं…….
डाक्टर चड्ढा ने कलाई पर नजर डाली। केवल दस मिनट समय और बाकी था। गोल्फ-स्टिक खूँटी से उतारने हुए बोले—कल सबेरे आओ, कल सबेरे; यह हमारे खेलने का समय है।


बूढ़े ने पगड़ी उतार कर चौखट पर रख दी और रो कर बोला—हूजुर, एक निगाह देख लें। बस, एक निगाह! लड़का हाथ से चला जायगा हुजूर, सात लड़कों में यही एक बच रहा है, हुजूर। हम दोनों आदमी रो-रोकर मर जायेंगे, सरकार! आपकी बढ़ती होय, दीनबंधु!
ऐसे उजड़ड देहाती यहॉँ प्राय: रोज आया करते थे। डाक्टर साहब उनके स्वभाव से खूब परिचित थे। कोई कितना ही कुछ कहे; पर वे अपनी ही रट लगाते जायँगे। किसी की सुनेंगे नहीं। धीरे से चिक उठाई और बाहर निकल कर मोटर की तरफ चले। बूढ़ा यह कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा—सरकार, बड़ा धरम होगा। हुजूर, दया कीजिए, बड़ा दीन-दुखी हूँ; संसार में कोई और नहीं है, बाबू जी!
मगर डाक्टर साहब ने उसकी ओर मुँह फेर कर देखा तक नहीं। मोटर पर बैठ कर बोले—कल सबेरे आना।

मोटर चली गयी। बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भॉँति निश्चल खड़ा रहा। संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवाह नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था। सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था। वह उन पुराने जमाने की जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। जब तक बूढ़े को मोटर दिखायी दी, वह खड़ा टकटकी लागाये उस ओर ताकता रहा। शायद उसे अब भी डाक्टर साहब के लौट आने की आशा थी। फिर उसने कहारों से डोली उठाने को कहा। डोली जिधर से आयी थी, उधर ही चली गयी। चारों ओर से निराश हो कर वह डाक्टर चड्ढा के पास आया था। इनकी बड़ी तारीफ सुनी थी। यहॉँ से निराश हो कर फिर वह किसी दूसरे डाक्टर के पास न गया। किस्मत ठोक ली!

उसी रात उसका हँसता-खेलता सात साल का बालक अपनी बाल-लीला समाप्त करके इस संसार से सिधार गया। बूढ़े मॉँ-बाप के जीवन का यही एक आधार था। इसी का मुँह देख कर जीते थे। इस दीपक के बुझते ही जीवन की अँधेरी रात भॉँय-भॉँय करने लगी। बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अंधकार आर्त्त-स्वर से रोने लगी।

2

कई साल गुजर गये। डाक्टर चड़ढा ने खूब यश और धन कमाया; लेकिन इसके साथ ही अपने स्वास्थ्य की रक्षा भी की, जो एक साधारण बात थी। यह उनके नियमित जीवन का आर्शीवाद था कि पचास वर्ष की अवस्था में उनकी चुस्ती और फुर्ती युवकों को भी लज्जित करती थी। उनके हरएक काम का समय नियत था, इस नियम से वह जौ-भर भी न टलते थे। बहुधा लोग स्वास्थ्य के नियमों का पालन उस समय करते हैं, जब रोगी हो जाते हें। डाक्टर चड्ढा उपचार और संयम का रहस्य खूब समझते थे। उनकी संतान-संध्या भी इसी नियम के अधीन थी। उनके केवल दो बच्चे हुए, एक लड़का और एक लड़की। तीसरी संतान न हुई, इसीलिए श्रीमती चड्ढा भी अभी जवान मालूम होती थीं। लड़की का तो विवाह हो चुका था। लड़का कालेज में पढ़ता था। वही माता-पिता के जीवन का आधार था। शील और विनय का पुतला, बड़ा ही रसिक, बड़ा ही उदार, विद्यालय का गौरव, युवक-समाज की शोभा। मुखमंडल से तेज की छटा-सी निकलती थी। आज उसकी बीसवीं सालगिरह थी।

संध्या का समय था। हरी-हरी घास पर कुर्सियॉँ बिछी हुई थी। शहर के रईस और हुक्काम एक तरफ, कालेज के छात्र दूसरी तरफ बैठे भोजन कर रहे थे। बिजली के प्रकाश से सारा मैदान जगमगा रहा था। आमोद-प्रमोद का सामान भी जमा था। छोटा-सा प्रहसन खेलने की तैयारी थी। प्रहसन स्वयं कैलाशनाथ ने लिखा था। वही मुख्य एक्टर भी था। इस समय वह एक रेशमी कमीज पहने, नंगे सिर, नंगे पॉँव, इधर से उधर मित्रों की आव भगत में लगा हुआ था। कोई पुकारता—कैलाश, जरा इधर आना; कोई उधर से बुलाता—कैलाश, क्या उधर ही रहोगे? सभी उसे छोड़ते थे, चुहलें करते थे, बेचारे को जरा दम मारने का अवकाश न मिलता था। सहसा एक रमणी ने उसके पास आकर पूछा—क्यों कैलाश, तुम्हारे सॉँप कहॉँ हैं? जरा मुझे दिखा दो।

कैलाश ने उससे हाथ मिला कर कहा—मृणालिनी, इस वक्त क्षमा करो, कल दिखा दूगॉँ।
मृणालिनी ने आग्रह किया—जी नहीं, तुम्हें दिखाना पड़ेगा, मै आज नहीं मानने की। तुम रोज ‘कल-कल’ करते हो।
मृणालिनी और कैलाश दोनों सहपाठी थे ओर एक-दूसरे के प्रेम में पगे हुए। कैलाश को सॉँपों के पालने, खेलाने और नचाने का शौक था। तरह-तरह के सॉँप पाल रखे थे। उनके स्वभाव और चरित्र की परीक्षा करता रहता था। थोड़े दिन हुए, उसने विद्यालय में ‘सॉँपों’ पर एक मार्के का व्याख्यान दिया था। सॉँपों को नचा कर दिखाया भी था! प्राणिशास्त्र के बड़े-बड़े पंडित भी यह व्याख्यान सुन कर दंग रह गये थे! यह विद्या उसने एक बड़े सँपेरे से सीखी थी। साँपों की जड़ी-बूटियॉँ जमा करने का उसे मरज था। इतना पता भर मिल जाय कि किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छी जड़ी है, फिर उसे चैन न आता था। उसे लेकर ही छोड़ता था। यही व्यसन था। इस पर हजारों रूपये फूँक चुका था। मृणालिनी कई बार आ चुकी थी; पर कभी सॉँपों को देखने के लिए इतनी उत्सुक न हुई थी। कह नहीं सकते, आज उसकी उत्सुकता सचमुच जाग गयी थी, या वह कैलाश पर उपने अधिकार का प्रदर्शन करना चाहती थी; पर उसका आग्रह बेमौका था। उस कोठरी में कितनी भीड़ लग जायगी, भीड़ को देख कर सॉँप कितने चौकेंगें और रात के समय उन्हें छेड़ा जाना कितना बुरा लगेगा, इन बातों का उसे जरा भी ध्यान न आया।

कैलाश ने कहा—नहीं, कल जरूर दिखा दूँगा। इस वक्त अच्छी तरह दिखा भी तो न सकूँगा, कमरे में तिल रखने को भी जगह न मिलेगी।
एक महाशय ने छेड़ कर कहा—दिखा क्यों नहीं देते, जरा-सी बात के लिए इतना टाल-मटोल कर रहे हो? मिस गोविंद, हर्गिज न मानना। देखें कैसे नहीं दिखाते!
दूसरे महाशय ने और रद्दा चढ़ाया—मिस गोविंद इतनी सीधी और भोली हैं, तभी आप इतना मिजाज करते हैं; दूसरे सुंदरी होती, तो इसी बात पर बिगड़ खड़ी होती।
तीसरे साहब ने मजाक उड़ाया—अजी बोलना छोड़ देती। भला, कोई बात है! इस पर आपका दावा है कि मृणालिनी के लिए जान हाजिर है।
मृणालिनी ने देखा कि ये शोहदे उसे रंग पर चढ़ा रहे हैं, तो बोली—आप लोग मेरी वकालत न करें, मैं खुद अपनी वकालत कर लूँगी। मैं इस वक्त सॉँपों का तमाशा नहीं देखना चाहती। चलो, छुट्टी हुई।

इस पर मित्रों ने ठट्टा लगाया। एक साहब बोले—देखना तो आप सब कुछ चाहें, पर दिखाये भी तो?
कैलाश को मृणालिनी की झेंपी हुई सूरत को देखकर मालूम हुआ कि इस वक्त उनका इनकार वास्तव में उसे बुरा लगा है। ज्योंही प्रीति-भोज समाप्त हुआ और गाना शुरू हुआ, उसने मृणालिनी और अन्य मित्रों को सॉँपों के दरबे के सामने ले जाकर महुअर बजाना शुरू किया। फिर एक-एक खाना खोलकर एक-एक सॉँप को निकालने लगा। वाह! क्या कमाल था! ऐसा जान पड़ता था कि वे कीड़े उसकी एक-एक बात, उसके मन का एक-एक भाव समझते हैं। किसी को उठा लिया, किसी को गरदन में डाल लिया, किसी को हाथ में लपेट लिया। मृणालिनी बार-बार मना करती कि इन्हें गर्दन में न डालों, दूर ही से दिखा दो। बस, जरा नचा दो। कैलाश की गरदन में सॉँपों को लिपटते देख कर उसकी जान निकली जाती थी। पछता रही थी कि मैंने व्यर्थ ही इनसे सॉँप दिखाने को कहा; मगर कैलाश एक न सुनता था। प्रेमिका के सम्मुख अपने सर्प-कला-प्रदर्शन का ऐसा अवसर पाकर वह कब चूकता! एक मित्र ने टीका की—दॉँत तोड़ डाले होंगे।
कैलाश हँसकर बोला—दॉँत तोड़ डालना मदारियों का काम है। किसी के दॉँत नहीं तोड़ गये। कहिए तो दिखा दूँ? कह कर उसने एक काले सॉँप को पकड़ लिया और बोला—‘मेरे पास इससे बड़ा और जहरीला सॉँप दूसरा नहीं है, अगर किसी को काट ले, तो आदमी आनन-फानन में मर जाय। लहर भी न आये। इसके काटे पर मन्त्र नहीं। इसके दॉँत दिखा दूँ?’


मृणालिनी ने उसका हाथ पकड़कर कहा—नहीं-नहीं, कैलाश, ईश्वर के लिए इसे छोड़ दो। तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ।
इस पर एक-दूसरे मित्र बोले—मुझे तो विश्वास नहीं आता, लेकिन तुम कहते हो, तो मान लूँगा।
कैलाश ने सॉँप की गरदन पकड़कर कहा—नहीं साहब, आप ऑंखों से देख कर मानिए। दॉँत तोड़कर वश में किया, तो क्या। सॉँप बड़ा समझदार होता हैं! अगर उसे विश्वास हो जाय कि इस आदमी से मुझे कोई हानि न पहुँचेगी, तो वह उसे हर्गिज न काटेगा।
मृणालिनी ने जब देखा कि कैलाश पर इस वक्त भूत सवार है, तो उसने यह तमाशा न करने के विचार से कहा—अच्छा भाई, अब यहॉँ से चलो। देखा, गाना शुरू हो गया है। आज मैं भी कोई चीज सुनाऊँगी। यह कहते हुए उसने कैलाश का कंधा पकड़ कर चलने का इशारा किया और कमरे से निकल गयी; मगर कैलाश विरोधियों का शंका-समाधान करके ही दम लेना चाहता था। उसने सॉँप की गरदन पकड़ कर जोर से दबायी, इतनी जोर से इबायी कि उसका मुँह लाल हो गया, देह की सारी नसें तन गयीं। सॉँप ने अब तक उसके हाथों ऐसा व्यवहार न देखा था। उसकी समझ में न आता था कि यह मुझसे क्या चाहते हें। उसे शायद भ्रम हुआ कि मुझे मार डालना चाहते हैं, अतएव वह आत्मरक्षा के लिए तैयार हो गया।

कैलाश ने उसकी गर्दन खूब दबा कर मुँह खोल दिया और उसके जहरीले दॉँत दिखाते हुए बोला—जिन सज्जनों को शक हो, आकर देख लें। आया विश्वास या अब भी कुछ शक है? मित्रों ने आकर उसके दॉँत देखें और चकित हो गये। प्रत्यक्ष प्रमाण के सामने सन्देह को स्थान कहॉँ। मित्रों का शंका-निवारण करके कैलाश ने सॉँप की गर्दन ढीली कर दी और उसे जमीन पर रखना चाहा, पर वह काला गेहूँवन क्रोध से पागल हो रहा था। गर्दन नरम पड़ते ही उसने सिर उठा कर कैलाश की उँगली में जोर से काटा और वहॉँ से भागा। कैलाश की ऊँगली से टप-टप खून टपकने लगा। उसने जोर से उँगली दबा ली और उपने कमरे की तरफ दौड़ा। वहॉँ मेज की दराज में एक जड़ी रखी हुई थी, जिसे पीस कर लगा देने से घतक विष भी रफू हो जाता था।

मित्रों में हलचल पड़ गई। बाहर महफिल में भी खबर हुई। डाक्टर साहब घबरा कर दौड़े। फौरन उँगली की जड़ कस कर बॉँधी गयी और जड़ी पीसने के लिए दी गयी। डाक्टर साहब जड़ी के कायल न थे। वह उँगली का डसा भाग नश्तर से काट देना चाहते, मगर कैलाश को जड़ी पर पूर्ण विश्वास था। मृणालिनी प्यानों पर बैठी हुई थी। यह खबर सुनते ही दौड़ी, और कैलाश की उँगली से टपकते हुए खून को रूमाल से पोंछने लगी। जड़ी पीसी जाने लगी; पर उसी एक मिनट में कैलाश की ऑंखें झपकने लगीं, ओठों पर पीलापन दौड़ने लगा। यहॉँ तक कि वह खड़ा न रह सका। फर्श पर बैठ गया। सारे मेहमान कमरे में जमा हो गए। कोई कुछ कहता था। कोई कुछ। इतने में जड़ी पीसकर आ गयी। मृणालिनी ने उँगली पर लेप किया। एक मिनट और बीता। कैलाश की ऑंखें बन्द हो गयीं। वह लेट गया और हाथ से पंखा झलने का इशारा किया। मॉँ ने दौड़कर उसका सिर गोद में रख लिया और बिजली का टेबुल-फैन लगा दिया।

डाक्टर साहब ने झुक कर पूछा कैलाश, कैसी तबीयत है? कैलाश ने धीरे से हाथ उठा लिए; पर कुछ बोल न सका। मृणालिनी ने करूण स्वर में कहा—क्या जड़ी कुछ असर न करेंगी? डाक्टर साहब ने सिर पकड़ कर कहा—क्या बतलाऊँ, मैं इसकी बातों में आ गया। अब तो नश्तर से भी कुछ फायदा न होगा।
आध घंटे तक यही हाल रहा। कैलाश की दशा प्रतिक्षण बिगड़ती जाती थी। यहॉँ तक कि उसकी ऑंखें पथरा गयी, हाथ-पॉँव ठंडे पड़ गये, मुख की कांति मलिन पड़ गयी, नाड़ी का कहीं पता नहीं। मौत के सारे लक्षण दिखायी देने लगे। घर में कुहराम मच गया। मृणालिनी एक ओर सिर पीटने लगी; मॉँ अलग पछाड़े खाने लगी। डाक्टर चड्ढा को मित्रों ने पकड़ लिया, नहीं तो वह नश्तर अपनी गर्दन पर मार लेते।


एक महाशय बोले—कोई मंत्र झाड़ने वाला मिले, तो सम्भव है, अब भी जान बच जाय।
एक मुसलमान सज्जन ने इसका समर्थन किया—अरे साहब कब्र में पड़ी हुई लाशें जिन्दा हो गयी हैं। ऐसे-ऐसे बाकमाल पड़े हुए हैं।
डाक्टर चड्ढा बोले—मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गया था कि इसकी बातों में आ गया। नश्तर लगा देता, तो यह नौबत ही क्यों आती। बार-बार समझाता रहा कि बेटा, सॉँप न पालो, मगर कौन सुनता था! बुलाइए, किसी झाड़-फूँक करने वाले ही को बुलाइए। मेरा सब कुछ ले ले, मैं अपनी सारी जायदाद उसके पैरों पर रख दूँगा। लँगोटी बॉँध कर घर से निकल जाऊँगा; मगर मेरा कैलाश, मेरा प्यारा कैलाश उठ बैठे। ईश्वर के लिए किसी को बुलवाइए।

एक महाशय का किसी झाड़ने वाले से परिचय था। वह दौड़कर उसे बुला लाये; मगर कैलाश की सूरत देखकर उसे मंत्र चलाने की हिम्मत न पड़ी। बोला—अब क्या हो सकता है, सरकार? जो कुछ होना था, हो चुका?
अरे मूर्ख, यह क्यों नही कहता कि जो कुछ न होना था, वह कहॉँ हुआ? मॉँ-बाप ने बेटे का सेहरा कहॉँ देखा? मृणालिनी का कामना-तरू क्या पल्लव और पुष्प से रंजित हो उठा? मन के वह स्वर्ण-स्वप्न जिनसे जीवन आनंद का स्रोत बना हुआ था, क्या पूरे हो गये? जीवन के नृत्यमय तारिका-मंडित सागर में आमोद की बहार लूटते हुए क्या उनकी नौका जलमग्न नहीं हो गयी? जो न होना था, वह हो गया।

वही हरा-भरा मैदान था, वही सुनहरी चॉँदनी एक नि:शब्द संगीत की भॉँति प्रकृति पर छायी हुई थी; वही मित्र-समाज था। वही मनोरंजन के सामान थे। मगर जहाँ हास्य की ध्वनि थी, वहॉँ करूण क्रन्दन और अश्रु-प्रवाह था।

3

शहर से कई मील दूर एक छोट-से घर में एक बूढ़ा और बुढ़िया अगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। बूढ़ा नारियल पीता था और बीच-बीच में खॉँसता था। बुढ़िया दोनों घुटनियों में सिर डाले आग की ओर ताक रही थी। एक मिट्टी के तेल की कुप्पी ताक पर जल रही थी। घर में न चारपाई थी, न बिछौना। एक किनारे थोड़ी-सी पुआल पड़ी हुई थी। इसी कोठरी में एक चूल्हा था। बुढ़िया दिन-भर उपले और सूखी लकड़ियॉँ बटोरती थी। बूढ़ा रस्सी बट कर बाजार में बेच आता था। यही उनकी जीविका थी। उन्हें न किसी ने रोते देखा, न हँसते।

उनका सारा समय जीवित रहने में कट जाता था। मौत द्वार पर खड़ी थी, रोने या हँसने की कहॉँ फुरसत! बुढ़िया ने पूछा—कल के लिए सन तो है नहीं, काम क्या करोंगे?
‘जा कर झगडू साह से दस सेर सन उधार लाऊँगा?’
‘उसके पहले के पैसे तो दिये ही नहीं, और उधार कैसे देगा?’
‘न देगा न सही। घास तो कहीं नहीं गयी। दोपहर तक क्या दो आने की भी न काटूँगा?’
इतने में एक आदमी ने द्वार पर आवाज दी—भगत, भगत, क्या सो गये? जरा किवाड़ खोलो।

भगत ने उठकर किवाड़ खोल दिये। एक आदमी ने अन्दर आकर कहा—कुछ सुना, डाक्टर चड्ढा बाबू के लड़के को सॉँप ने काट लिया।
भगत ने चौंक कर कहा—चड्ढा बाबू के लड़के को! वही चड्ढा बाबू हैं न, जो छावनी में बँगले में रहते हैं?
‘हॉँ-हॉँ वही। शहर में हल्ला मचा हुआ है। जाते हो तो जाओं, आदमी बन जाओंगे।‘
बूढ़े ने कठोर भाव से सिर हिला कर कहा—मैं नहीं जाता! मेरी बला जाय! वही चड्ढा है। खूब जानता हूँ। भैया लेकर उन्हीं के पास गया था। खेलने जा रहे थे। पैरों पर गिर पड़ा कि एक नजर देख लीजिए; मगर सीधे मुँह से बात तक न की। भगवान बैठे सुन रहे थे। अब जान पड़ेगा कि बेटे का गम कैसा होता है। कई लड़के हैं।
‘नहीं जी, यही तो एक लड़का था। सुना है, सबने जवाब दे दिया है।‘
‘भगवान बड़ा कारसाज है। उस बखत मेरी ऑंखें से ऑंसू निकल पड़े थे, पर उन्हें तनिक भी दया न आयी थी। मैं तो उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता।‘
‘तो न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया।‘

‘अच्छा किया—अच्छा किया। कलेजा ठंडा हो गया, ऑंखें ठंडी हो गयीं। लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ। आज चैन की नींद सोऊँगा। (बुढ़िया से) जरा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊँगा। अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जायगी, हमारा क्या बिगड़ा। लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहॉँ छ: बच्चे गये थे, वहॉँ एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जायगा। उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न। अब क्या करोंगे? एक बार देखने जाऊँगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूँगा।‘
आदमी चला गया। भगत ने किवाड़ बन्द कर लिये, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा।

बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जायगा?
‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता। सवारी दरवाजे पर लेने आती, तो भी न जाता। भूल नहीं गया हूँ। पन्ना की सूरत ऑंखों में फिर रही है। इस निर्दयी ने उसे एक नजर देखा तक नहीं। क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? खूब जानता था। चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाहदेख लेने से अमृत बरस जाता। नहीं, खाली मन की दौड़ थी। अब किसी दिन जाऊँगा और कहूँगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं। छोटे आदमियों में तो सब ऐव हें। बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं।‘

भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो। अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सॉँप की खबर पाकर वह दौड़ न गया हो। माघ-पूस की अँधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की। वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं। यह सा काम ही न था। जान का मूल्य कोन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था। सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से कदम नहीं निकाल सका। यह खबर सुन कर सोने जा रहा है।
बुढ़िया ने कहा—तमाखू अँगीठी के पास रखी हुई है। उसके भी आज ढाई पैसे हो गये। देती ही न थी।

बुढ़िया यह कह कर लेटी। बूढ़े ने कुप्पी बुझायी, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया। अन्त को लेट गया; पर यह खबर उसके हृदय पर बोझे की भॉँति रखी हुई थी। उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज खो गयी है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गये है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है। बुढ़िया जरा देर में खर्राटे लेनी लगी। बूढ़े बातें करते-करते सोते है और जरा-सा खटा होते ही जागते हैं। तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले।
बुढ़िया ने पूछा—कहॉँ जाते हो?
‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है।‘
‘अभी बहुत रात है, सो जाओ।‘
‘नींद, नहीं आतीं।’
‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड़ढा के घर पर लगा हुआ है।‘
‘चड़ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहॉँ जाऊँ? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊँ।‘
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूँ कि जो मुझे कॉँटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूँ।‘

बुढ़िया फिर सो गयी। भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा। पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं। ऑंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं। दिल में भी बापे की ध्वनि गूँजती रहती हे। शर्म के मारे जगह से नहीं उठता। निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था।

उसने फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे से कि बुढ़िया को खबर भी न हुई। बाहर निकल आया। उसी वक्त गॉँव को चौकीदार गश्त लगा रहा था, बोला—कैसे उठे भगत? आज तो बड़ी सरदी है! कहीं जा रहे हो क्या?
भगत ने कहा—नहीं जी, जाऊँगा कहॉँ! देखता था, अभी कितनी रात है। भला, के बजे होंगे।
चौकीदार बोला—एक बजा होगा और क्या, अभी थाने से आ रहा था, तो डाक्टर चड़ढा बाबू के बॅगले पर बड़ी भड़ लगी हुई थी। उनके लड़के का हाल तो तुमने सुना होगा, कीड़े ने छू लियाहै। चाहे मर भी गया हो। तुम चले जाओं तो साइत बच जाय। सुना है, इस हजार तक देने को तैयार हैं।
भगत—मैं तो न जाऊँ चाहे वह दस लाख भी दें। मुझे दस हजार या दस लाखे लेकर करना क्या हैं? कल मर जाऊँगा, फिर कौन भोगनेवाला बैठा हुआ है।
चौकीदार चला गया। भगत ने आगे पैर बढ़ाया। जैसे नशे में आदमी की देह अपने काबू में नहीं रहती, पैर कहीं रखता है, पड़ता कहीं है, कहता कुछ हे, जबान से निकलता कुछ है, वही हाल इस समय भगत का था। मन में प्रतिकार था; पर कर्म मन के अधीन न था। जिसने कभी तलवार नहीं चलायी, वह इरादा करने पर भी तलवार नहीं चला सकता। उसके हाथ कॉँपते हैं, उठते ही नहीं।

भगत लाठी खट-खट करता लपका चला जाता था। चेतना रोकती थी, पर उपचेतना ठेलती थी। सेवक स्वामी पर हावी था।
आधी राह निकल जाने के बाद सहसा भगत रूक गया। हिंसा ने क्रिया पर विजय पायी—मै यों ही इतनी दूर चला आया। इस जाड़े-पाले में मरने की मुझे क्या पड़ी थी? आराम से सोया क्यों नहीं? नींद न आती, न सही; दो-चार भजन ही गाता। व्यर्थ इतनी दूर दौड़ा आया। चड़ढा का लड़का रहे या मरे, मेरी कला से। मेरे साथ उन्होंने ऐसा कौन-सा सलूक किया था कि मै उनके लिए मरूँ? दुनिया में हजारों मरते हें, हजारों जीते हें। मुझे किसी के मरने-जीने से मतलब!

मगर उपचेतन ने अब एक दूसर रूप धारण किया, जो हिंसा से बहुत कुछ मिलता-जुलता था—वह झाड़-फूँक करने नहीं जा रहा है; वह देखेगा, कि लोग क्या कर रहे हें। डाक्टर साहब का रोना-पीटना देखेगा, किस तरह सिर पीटते हें, किस तरह पछाड़े खाते है! वे लोग तो विद्वान होते हैं, सबर कर जाते होंगे! हिंसा-भाव को यों धीरज देता हुआ वह फिर आगे बढ़ा।

इतने में दो आदमी आते दिखायी दिये। दोनों बाते करते चले आ रहे थे—चड़ढा बाबू का घर उजड़ गया, वही तो एक लड़का था। भगत के कान में यह आवाज पड़ी। उसकी चाल और भी तेज हो गयी। थकान के मारे पॉँव न उठते थे। शिरोभाग इतना बढ़ा जाता था, मानों अब मुँह के बल गिर पड़ेगा। इस तरह वह कोई दस मिनट चला होगा कि डाक्टर साहब का बँगला नजर आया। बिजली की बत्तियॉँ जल रही थीं; मगर सन्नाटा छाया हुआ था। रोने-पीटने के आवाज भी न आती थी। भगत का कलेजा धक-धक करने लगा। कहीं मुझे बहुत देर तो नहीं हो गयी? वह दौड़ने लगा। अपनी उम्र में वह इतना तेज कभी न दौड़ा था। बस, यही मालूम होता था, मानो उसके पीछे मोत दौड़ी आ री है।

4

दो बज गये थे। मेहमान विदा हो गये। रोने वालों में केवल आकाश के तारे रह गये थे। और सभी रो-रो कर थक गये थे। बड़ी उत्सुकता के साथ लोग रह-रह आकाश की ओर देखते थे कि किसी तरह सुहि हो और लाश गंगा की गोद में दी जाय।
सहसा भगत ने द्वार पर पहुँच कर आवाज दी। डाक्टर साहब समझे, कोई मरीज आया होगा। किसी और दिन उन्होंने उस आदमी को दुत्कार दिया होता; मगर आज बाहर निकल आये। देखा एक बूढ़ा आदमी खड़ा है—कमर झुकी हुई, पोपला मुँह, भौहे तक सफेद हो गयी थीं। लकड़ी के सहारे कॉँप रहा था। बड़ी नम्रता से बोले—क्या है भई, आज तो हमारे ऊपर ऐसी मुसीबत पड़ गयी है कि कुछ कहते नहीं बनता, फिर कभी आना। इधर एक महीना तक तो शायद मै किसी भी मरीज को न देख सकूँगा।
भगत ने कहा—सुन चुका हूँ बाबू जी, इसीलिए आया हूँ। भैया कहॉँ है? जरा मुझे दिखा दीजिए। भगवान बड़ा कारसाज है, मुरदे को भी जिला सकता है। कौन जाने, अब भी उसे दया आ जाय।

चड़ढा ने व्यथित स्वर से कहा—चलो, देख लो; मगर तीन-चार घंटे हो गये। जो कुछ होना था, हो चुका। बहुतेर झाड़ने-फँकने वाले देख-देख कर चले गये।
डाक्टर साहब को आशा तो क्या होती। हॉँ बूढे पर दया आ गयी। अन्दर ले गये। भगत ने लाश को एक मिनट तक देखा। तब मुस्करा कर बोला—अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, बाबू जी! यह नारायण चाहेंगे, तो आध घंटे में भैया उठ बैठेगे। आप नाहक दिल छोटा कर रहे है। जरा कहारों से कहिए, पानी तो भरें।

कहारों ने पानी भर-भर कर कैलाश को नहलाना शुरू कियां पाइप बन्द हो गया था। कहारों की संख्या अधिक न थी, इसलिए मेहमानों ने अहाते के बाहर के कुऍं से पानी भर-भर कर कहानों को दिया, मृणालिनी कलासा लिए पानी ला रही थी। बुढ़ा भगत खड़ा मुस्करा-मुस्करा कर मंत्र पढ़ रहा था, मानो विजय उसके सामने खड़ी है। जब एक बार मंत्र समाप्त हो जाता, वब वह एक जड़ी कैलाश के सिर पर डाले गये और न-जाने कितनी बार भगत ने मंत्र फूँका। आखिर जब उषा ने अपनी लाल-लाल ऑंखें खोलीं तो केलाश की भी लाल-लाल ऑंखें खुल गयी। एक क्षण में उसने अंगड़ाई ली और पानी पीने को मॉँगा। डाक्टर चड़ढा ने दौड़ कर नारायणी को गले लगा लिया। नारायणी दौड़कर भगत के पैरों पर गिर पड़ी और म़णालिनी कैलाश के सामने ऑंखों में ऑंसू-भरे पूछने लगी—अब कैसी तबियत है!

एक क्षण् में चारों तरफ खबर फैल गयी। मित्रगण मुबारकवाद देने आने लगे। डाक्टर साहब बड़े श्रद्धा-भाव से हर एक के हसामने भगत का यश गाते फिरते थे। सभी लोग भगत के दर्शनों के लिए उत्सुक हो उठे; मगर अन्दर जा कर देखा, तो भगत का कहीं पता न था। नौकरों ने कहा—अभी तो यहीं बैठे चिलम पी रहे थे। हम लोग तमाखू देने लगे, तो नहीं ली, अपने पास से तमाखू निकाल कर भरी।
यहॉँ तो भगत की चारों ओर तलाश होने लगी, और भगत लपका हुआ घर चला जा रहा था कि बुढ़िया के उठने से पहले पहुँच जाऊँ!
जब मेहमान लोग चले गये, तो डाक्टर साहब ने नारायणी से कहा—बुड़ढा न-जाने कहाँ चला गया। एक चिलम तमाखू का भी रवादार न हुआ।
नारायणी—मैंने तो सोचा था, इसे कोई बड़ी रकम दूँगी।

चड़ढा—रात को तो मैंने नहीं पहचाना, पर जरा साफ हो जाने पर पहचान गया। एक बार यह एक मरीज को लेकर आया था। मुझे अब याद आता हे कि मै खेलने जा रहा था और मरीज को देखने से इनकार कर दिया था। आप उस दिन की बात याद करके मुझें जितनी ग्लानि हो रही है, उसे प्रकट नहीं कर सकता। मैं उसे अब खोज निकालूँगा और उसके पेरों पर गिर कर अपना अपराध क्षमा कराऊँगा। वह कुछ लेगा नहीं, यह जानता हूँ, उसका जन्म यश की वर्षा करने ही के लिए हुआ है। उसकी सज्जनता ने मुझे ऐसा आदर्श दिखा दिया है, जो अब से जीवनपर्यन्त मेरे सामने रहेगा।

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Best Roposo Shayari in Hindi - Roposo Sad Shayari - Roposo Status in Hindi - Roposo Love Shayari | अध्याय 1

July 30, 2020

1. Roposo Shayari:

जिस दिन लड़की के बाप बन जाओगे
 ना साहब...😊
लड़की माल नही घर का
मान नज़र आएगी... 😊

Jis Din Ladki Ke Baap Ban Jaoge
Na Saahab...😊
Ladki Maal Nahi Ghar Ka
Maan Nazar Aayegi... 😊

2. Roposo Sad Shayari:

बहुत बड़ी तकलीफ से गुजर रहा हू मैं,
अब किस किस से मोहब्बत करूँ?? 
Tik Tok देख बस यही दिल बहला रहा हु मैं !😃😃

Bahut Badee Takaleeph Se Gujar Raha Hoo Main,
Ab Kis Kis Se Mohabbat Karoon?? 
Tiktok Dekh Bas Yahee Dil Bahala Raha Hu Main !😃😃

3. Roposo Sad Shayari

Sar Se Lekar Paon Tak 
Poora Badan Kaanp Raha Tha 
Jab Khabar Mili Tere Saath 
Raate Koi Doosra Kaat Raha Tha

पूरा बदन काँप रहा था 
जब खबर मिली तेरे साथ 
राते कोई दूसरा काट रहा था

मेरी सोच ने उसे अभी तक पकड़ा हुआ है

मैं भगवान को पूजता हूँ और
अल्लाह को भी मानता हूँ

फिर भी लोग कहते है
लड़का बिगड़ा हुआ है

Mera Meri Soch Se Jhagda Hua Hai
Meree Soch Ne Use Abhi Tak Pakda Hua Hai

Main Bhagavaan Ko Poojta Hoon
Aur Allah Ko Bhi Manta Hoon

Phir Bhi Log Kahte Hai
Ladka Bigda Hua Hai

4. Roposo Love Shayari:

तुम निकलो तो मेरी खोज में
मैं यही कही मिल जाऊंगा।
लेकिन एक शर्त पर मिलूंगा मैं
तुम खोजने मुझे ही निकालना।

Tum Nikalo to Meree Khoj Mein
Main Yahee Kahee Mil Jaoonga.
Lekin Ek Shart Par Miloonga Main
Tum Khojane Mujhe Hee Nikaalana.

5. Roposo Status in Hindi

आधी लिखूँगा, मगर हर बात लिख दूंगा
तुम गालिया मत देना मेरी पीठ के पीछे
उठा ली कलम तो तुम्हारी औकात लिख दूंगा

Aadhi Likhunga, Magar Har Baat Likh Dunga
Tum Gaaliya Mat Dena Meri Peeth Ke Piche
Utha Li Kalam to Tumhari Aukat Likh Dunga

6. Roposo Famous Shayari

कोन कहता है कि 
मोहब्ब्त करने वाले आंसू बहाते हैं,
कभी Tik Tok चलाया है?
वहा तो लोग ग़म में आंसू तो क्या 
पूरा नाला बहा देते हैं 🤔

Kon Kahata Hai Ki 
Mohabbt Karane Vaale Aansoo Bahaate Hain,
Kabhi Tik Tok Chalaya Hai?
Vaha to Log Gam Mein Aansoo to Kya 
Poora Naala Baha Dete Hain 

7. Boy Roposo Sad Shayari

आज बुरा है 
कल अच्छा आएगा 
वक़्त ही तो है 
गुजर जायेगा

Aaj Bura Hai 
Kal Achchha Aaega 
Waqt Hee to Hai 
Gujar Jaayega

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'Rafale' की कहानी ... | Rafale and Rahul Gandhi

July 30, 2020

Rafale and Rahul Gandhi

'Rafale' की कहानी ...

Atal Govt : हमें वायुसेना के लिए 126 लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है।

Air Force : RFI निकालते हैं।

Air Force : हमारे अनुसार Rafale बेस्ट लड़ाकू जहाज़ रहेगा।

UPA : ये Rafale कितने का है ?

France : ₹936 करोड़ का है Rafale.

UPA : हमें ₹526 करोड़ में दे दो।

France: नही संभव है।

UPA : हमें, बिना Weapons के, बिना Maintenance के, बिना Spares के, बिना Guarantee के दे दो।

France : वो सब वैसे भी Additional है।

UPA : कम Availability Rate हो Rafale का 35%-40% तो भी चलेगा।

France : वहीं बनवा लो Rafale

UPA : अच्छा Offset कितना है ?

France: 30% Offset रहेगा।

UPA : दे दो न प्लीज ₹526 करोड़ में।

France : नहीं दे सकते बोला न।

UPA : अच्छा 18 ही दे दो बाकी हम India में बनवा लेंगे।

France: पर कौन बनाएगा?

UPA : HAL से बनवा लेंगे India में।

France : पर HAL तो स्टैण्डर्ड के लिए उतनी Manpower देने को तैयार ही नहीं है।

UPA : ओह, खैर हमारे पास तो Rafale खरीदने के पैसे ही नहीं हैं।

NDA : हमें Rafale खरीदने हैं।

France: जी, बताइये।

NDA : कितने का पड़ेगा Rafale ?

France : वही ₹936 करोड़ का, लेकिन escalation कॉस्ट बढ़ जाएगी अब।

NDA : हमें India Specific Changes भी चाहिए।

France: और ...

NDA : हमें, Weapons पैकेज, Maintenance सपोर्ट, Spare पार्ट्स, Guarantee भी चाहिए।

France: और ...

NDA : हमें, 75% से ज्यादा Availability Rate चाहिए।

France: और ...

NDA : हमें Offset भी 50% चाहिए।

France : फिर तो Cost बहोत ही ज्यादा बढ़ जाएगी।

NDA : आप कॉस्ट बताइये तो।

France : फिर तो कॉस्ट करीब ₹1,988 करोड़ पड़ेगी।

NDA: Offset देंगे 50%?

France : हाँ, ₹30,000 करोड़ इन्वेस्टमेंट कर देंगे India में Offset के अंतर्गत।

NDA : ठीक है लेकिन Cost कुछ कम कीजिये।

France : आप कितने Rafale लेंगे ?

NDA : कॉस्ट कम कर देंगे तो अभी 36 Fly-Away में लेंगे और फिर बाकी India में बनवाएंगे।

France : India में किससे बनवाएंगे ?

NDA : India में PPP मॉडल पर बनवाएंगे, नया टेंडर निकालेंगे और 110 विमानों का निकलेंगे।

France : मतलब आप अब 126 की जगह 36 + 110 = 146 लड़ाकू जहाज़ खरीदेंगे।

NDA: हाँ

France : ठीक है, ₹1,638 करोड़ से कम में नही दे पाएंगे Rafale, डील कब साइन करेंगे ?

NDA: तुरंत।

Congress : हाय हाय, हम तो ₹526 करोड़ में खरीद रहे थे Rafale.

Congress : हम Court जाएंगे।

SC : Modi सरकार की Rafale Deal एकदम क्लीन है।

Congress : वो Anil Ambani को ₹30,000 करोड़ का Offset दे दिया।

NDA : ₹30,000 के Offset में 100 कंपनियां है, Reliance और Dassault का Offset सिर्फ ₹850 करोड़ का है।

Congress : पर Rate ज्यादा है, उसका क्या ?

CAG : बेसिक Aircraft 2.86% सस्ता है। बाकी जो एक्स्ट्रा फीचर लिए है उसके कारण ओवरआल कॉस्ट ज्यादा है।

Congress: But But But ... "चौकीदार चोर है"

SC : आपको माफ़ी मांगनी पड़ेगी।

RG : Ok. मुझे माफ़ कर दो, मैं हाँथ जोड़कर माफ़ी मांगता हूँ।

NDA : निश्चित हुआ कि हमारी Rafale डील बेहतर और ज्यादा रोबस्ट है।

Congress : हम SC और CAG को नही मानते, हम तो ₹526 करोड़ में खरीद रहे थे Rafale. "हाय हाय"।

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Baarish Evergreen Sayri in Hindi | Shayari on Barish in Hindi

July 30, 2020

नसीब की बारिश कुछ इस तरह से होती रही मुझ पे...
ख्वाहिशे सुखती रही और पलके भीगती रही

Naseeb Ki Barish Kuch is Tarah Se Hoti Rahi Mujh Pe...
Khwahishe Sukhati Rahee Aur Palake Bheegti Rahee

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Husband and Wife Jokes in English

July 27, 2020


Husband and Wife Jokes in English

Husband borrowed Rs.250 from the wife.
After a few days, He again borrowed Rs.250. After a few days, she asked the husband to return the money.

When asked how much the wife said that he owes her Rs.4100.

On request, below Calculations given his wife.

1) Rs. 2   5   0
2) Rs. 2   5   0
          ————
    Rs. 4  10  0

Husband is still finding the school where she learned Maths.

Later  Husband gave her Rs.400 back and asked how much balance he has to payback

She wrote:

Rs. 4100
Rs. 400
————-
       0100

He gave back Rs.100.
Both lived happily ever after....
Only maths died.

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Who is the winner of IPL in 2020?

July 24, 2020

BSDK Suru to Hone De


WHO IS THE WINNER OF IPL IN 2020? @BHATKA_HUA_ASHIQ; BSDK SURU TO HONE DE | IPL jokes | ipl memes

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Bharat Varshonnati Kaise Ho Sakti Hai | भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है

July 22, 2020

आज बड़े आनंद का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत है। बनारस ऐसे-ऐसे बड़े नगरों में जब कुछ नहीं होता तो हम यह न कहेंगे कि बलिया में जो कुछ हमने देखा वह बहुत ही प्रशंसा के योग्य है। इस उत्साह का मूल कारण जो हमने खोजा तो प्रगट हो गया कि इस देश के भाग्य से आजकल यहाँ सारा समाज ही एकत्र है। राबर्ट साहब बहादुर ऐसे कलेक्टर जहाँ हो वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो। जिस देश और काल में ईश्वर ने अकबर को उत्पन्न किया था उसी में अबुलफजल, बीरबल,टोडरमल को भी उत्पन्न किया। यहाँ राबर्ट साहब अकबर हैं जो मुंशी चतुर्भुज सहाय, मुंशी बिहारीलाल साहब आदि अबुलफजल और टोडरमल हैं। हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी है। यद्यपि फर्स्ट क्लास, सैकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी है पर बिना इंजिन सब नहीं चल सकती वैसी ही हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए 'का चुप साधि रहा बलवाना' फिर देखिए हनुमानजी को अपना बल कैसा याद आता है। सो बल कौन याद दिलावे। हिंदुस्तानी राजे-महाराजे, नवाब, रईस या हाकिम। राजे-महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छुट्टी नहीं। हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है कुछ बाल-घुड़दौड़, थियेटर में समय लगा। कुछ समय बचा भी तो उनको क्या गरह है कि हम गरीब, गंदे, काले आदमियों से मिल कर अपना अनमोल समय खोवें। बस यही मसल रही -

"तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली।
चलो बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली॥"

तीन मेंढ़क एक के ऊपर एक बैठे थे। ऊपर वाले ने कहा, 'जौक शौक', बीच वाल बोला, 'गम सम',सब के नीचे वाला पुकारा, 'गए हम'। सो हिंदुस्तान की प्रजा की दशा यही है 'गए हम'। पहले भी जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आकर बसे थे राजा और ब्राह्मणों के जिम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलावें और अब भी ये लोग चाहें तो हिंदुस्तान प्रतिदिन क्या प्रतिछिन बढ़े। पर इन्हीं लोगों को निकम्मेपन ने घेर रखा है। 'बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः समर दूषिताः' हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जबकि इनके पुरुखों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठ कर बाँस की नालियों से जो तारा, ग्रह आदि बेध कर के उनकी गति लिखी है वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुपए की लागत से विलायत में जो दूरबीन बनी है उनसे उन ग्रहों को वेध करने में भी ठीक वही गति आती है और अब आज इस काल में हम लोगों की अंग्रेजी विद्या के और जनता की उन्नति से लाखों पुस्तकें और हजारों यंत्र तैयार हैं जब हम लोग निरी चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी बन रहे हैं। यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन, ‍‍अंग्रेज, फरांसीस आदि तुरकी-ताजी सब सरपट्ट दौड़े जाते हैं। सब के जी में यही है कि पाला हमी पहले छू लें। उस समय हिंदू का टियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं। इनको औरों को जाने दीजिए जापानी टट्टुओं को हाँफते हुए दौड़ते देख कर के भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जाएगा फिर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सकेगा। लूट की इस बरसात में भी जिस के सिर पर कम्बख्ती का छाता और आँखों में मूर्खता की पट्टी बँधी रहे उन पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए।

मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज कुछ कहो कि हिंदुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है। भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ भागवत में एक श्लोक है - "नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं मयाsनुकूलेन तपः स्वतेरितं पुमान भवाब्धि न तरेत स आत्महा।" भगवान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जन्म ही दुर्लभ है सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और उस पर मेरी अनुकूलता। इतना सामान पाकर भी मनुष्य इस संसार सागर के पार न जाए उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए, वही दशा इस समय हिंदुस्तान की है। अंग्रेजों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पा कर भी हम लोग जो इस समय उन्नति न करें तो हमारे केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है। सास और अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंग महल में जाकर भी बहुत दिनों से प्राण से प्यारे परदेसी पति से मिल कर छाती ठंडी करने की इच्छा भी उसका लाज से मुँह भी न देखे और बोले भी न तो उसका अभाग्य ही है। वह तो कल परदेस चला जाएगा। वैसे ही अंग्रेजों के राज्य में भी जो हम मेंढ़क, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम ही रहें तो फिर हमारी कमबख्त कमबख्ती फिर कमबख्ती ही है। बहुत लोग यह कहेंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती, बाबा, हम क्या उन्नति करें। तुम्हारा पेट भरा है तुम को दून की सूझती है। उसने एक हाथ से अपना पेट भरा दूसरे हाथ से उन्नति के काँटों को साफ किया। क्या इंग्लैंड में किसान, खेत वाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते, किंतु वे लोग जहाँ खेत जोतते-बाते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी कौन नई कल व मसाला बनावें जिससे इस खेत में आगे से दून अनाज उपजे। विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला। यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी। वहाँ के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध छाँटते हैं। सिद्धांत यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाए। उसके बदले यहाँ के लोगों को जितना निकम्मापन हो उतना ही बड़ा अमीर समझा जाता है। आलस्य यहाँ इतनी बढ़ गई कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला -

"अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
दास मलूका कहि गए सबके दाता राम॥"

चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करने वालों की ही चारों ओर बढ़ती है। रोजगार कहीं कुछ भी नहीं है अमीरों, मुसाहिबी, दल्लालों या अमीरों के नौजवान लड़कों को खराब करना या किसी की जमा मार लेना इनके सिवा बतलाइए और कौन रोजगार है जिससे कुछ रुपया मिले। चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुई है किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र कुटुंबी इस तरह अपनी इज्जत को बचाता फिरता है जैसे लाजवंती बहू फटें कपड़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है। वही दशा हिंदुस्तान की है। मुर्दम-शुमारी का रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन-दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन-दिन कमती होता जाता है। सो अब बिना ऐसा उपाय किए काम नहीं चलेगा कि रुपया भी बढ़े और वह रुपया बिना बुद्धि के न बढ़ेगा। भाइयों, राजा-महाराजों का मुँह मत देखो। मत यह आशा रखो कि पंडित जी कथा में ऐसा उपाय बतलाएँगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े। तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो, कब तक अपने को जंगली, हूस, मूर्ख, बोदे, डरपोक पुकरवाओगे। दौड़ो इस घुड़दौड़ में, जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है। 'फिर कब-कब राम जनकपुर एहै' अब की जो पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहुँचोगे। जब पृथ्वीराज को कैद कर के गोर ले गए तो शहाबुद्दीन के भाई गयासुद्दीन से किसी ने कहा कि वह शब्दबेधी बाण बहुत अच्छा मारता है। एक दिन सभी नियत हुई और सात लोहे के तावे बाण से फोड़ने को रखे गए। पृथ्वीराज को लोगों ने पहिले से ही अंधा कर दिया था। संकेत यह हुआ कि जब गयासुद्दीन 'हूँ' करे तब वह तावे पर बाण मारे। चंद कवि भी उसके साथ कैदी था। यह सामान देख कर उसने यह दोहा पढ़ा -

"अब की चढ़ी कमान को जाने फिर कब चढ़े।
जिन चूके चहुआज इक्के मारय इक्क सर।"

उसका संकेत समझ कर जब गयासुद्दीन ने 'हूँ' किया तो पृथ्वीराज ने उसी को बाण मार दिया। वही बात अब है। 'अब की चढ़ी' इस समय में सरकार का राज्य पाकर और उन्नति का इतना सामान पाकर भी तुम लोग अपने को न सुधारों तो तुम्हीं रहो और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो। धर्म में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोजगार में, शिष्टाचार में, चाल चलन में, शरीर में,बल में, समाज में, युवा में, वृद्ध में, स्त्री में, पुरुष में, अमीर में, गरीब में, भारतवर्ष की सब आस्था, सब जाति,सब देश में उन्नति करो। सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटक हों। चाहे तुम्हें लोग निकम्मा कहें या नंगा कहें, कृस्तान कहें या भ्रष्ट कहें तुम केवल अपने देश की दीन दशा को देखो और उनकी बात मत सुनो। अपमान पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः स्वकार्य साधयेत धीमान कार्यध्वंसो हि मूर्खता। जो लोग अपने को देश-हितैषी मानते हों वह अपने सुख को होम करके, अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो। देखा-देखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा। अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो। कोई धर्म की आड़ में, कोई सुख की आड़ में छिपे हैं। उन चोरों को वहाँ-वहाँ से पकड़ कर लाओ। उनको बाँध-बाँध कर कैद करो। हम इससे बढ़कर क्या कहें कि जैसे तुम्हारे घर में कोई पुरुष व्याभिचार करने आवे तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शक्ति होगी उसका सत्यानाश करोगे उसी तरह इस समय जो-जो बातें तुम्हारे उन्नति पथ की काँटा हों उनकी जड़ खोद कर फेंक दो। कुछ मत डरो। जब तक सौ, दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जाएँगे , दरिद्र न हो जाएँगे , कैद न होंगे वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोई देश न सुधरेगा।

अब यह प्रश्न होगा कि भई हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है। किस को अच्छा समझे। क्या लें क्या छोड़ें तो कुछ बातें जो इस शीघ्रता से मेरे ध्यान में आती हैं उनको मैं कहता हूँ सुनो -

सब सुन्नियों का मूल धर्म है। इससे सबसे पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है। देखो अंग्रेजों की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली है इससे उनकी दिन-दिन कैसी उन्नति हुई है। उनको जाने दो अपने ही यहाँ देखो। तुम्हारे धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति समाजगठन वैद्यक आदि भरे हुए हैं। दो-एक मिसाल सुनो तुम्हारा बलिया के मेला का यहीं स्थान क्यों चुना गया है जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते। दस-दस, पाँच-पाँच कोस से ले लोग एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें। एक दूसरे का दुःख-सुख जानें। गृहस्थी के काम की वह चीजें जो गाँव में नहीं मिलतीं यहाँ से ले जाएँ। एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिसमें महिने में दो-एक उपवास से शरीर शुद्ध हो जाए। गंगाजी नहाने जाते हैं तो पहले पानी सिर पर चढ़ा कर तब पैर पर डालने का विधान क्यों है? जिससे तलुए से गरमी सिर पर चढ़कर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने सालभर में एक बार तो सफाई हो जाए। होली इसी हेतु है कि बसंत की बिगड़ी हवा स्थान-स्थान पर अग्नि जलने से स्वच्छ हो जाए। यही तिहवार ही तुम्हारी म्युनिसिपालिटी है। ऐसे ही सब पर्व, सब तीर्थ, व्रत आदि में कोई हीकमत है। उन लोगों ने धर्मनीति और समाजनीति को दूध पानी की भाँति मिला दिया है। खराबी जो बीच में हुई वह यह है कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मानने लिखे थे। इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धर्म मान लिया। भाइयों, वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरणकमल का भजन है। ये सब तो समाज धर्म है। जो देश काल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं। दूसरी खराबी यह हुई कि उन्हीं महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों ने अपने बाप-दादों का मतलब न समझकर बहुत से नए-नए धर्म बना कर शास्त्रों में धर दिए बस सभी तिथि व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए। सो इन बातों को अब एक बार आँख खोल कर देख और समझ लीजिए कि फलानी बात उन बुद्धिमान ऋषियों ने क्यों बनाई और उनमें देश और काल के अनुकूल और उपकारी हों उनका ग्रहण कीजिए। बहुत-सी बातें जो समाज विरुद्ध मानी जाती हैं किंतु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है उनको मत चलाइए। जैसा जहाज का सफर, विधवा-विवाह आदि। लड़कों की छोटेपन ही में शादी करके उनका बल,बीरज, आयुष्य सब मत घटाइए। आप उनके माँ-बाप हैं या शत्रु हैं। वीर्य उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए। नोन, तेल लकड़ी की फिक्र करने की बुद्धि सीख लेने दीजिए तब उनका पैर काठ में डालिए। कुलीन प्रथा,बहु विवाह आदि को दूर कीजिए। लड़कियों को भी पढ़ाइए किंतु इस चाल में नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल-धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें। वैष्णव, शास्त्र इत्यादि नाना प्रकार के लोग आपस में बैर छोड़ दें यह समय इन झगड़ों का नहीं। हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए जाति में कोई चाहे ऊँचा हो, चाहे नीचा हो सबका आदर कीजिए। जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए,छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए। सब लोग आपस में मिलिए। मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिंदुस्तान में बस कर वे लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें। ठीक भाइयों की भाँति हिंदुओं से बरताव करें। ऐसी बात जो हिंदुओं का जी दुखाने वाली हो न करें। घर में आग लगे सब जिठानी, द्यौरानी को आपस का डाह छोड़ कर एकसाथ वह आग बुझानी चाहिए। जो बात हिंदुओं का नहीं मयस्सर है वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त है। उनके जाति नहीं, खाने-पीने में चौका-चूल्हा नहीं, विलायत जाने में रोक-टोक नहीं, फिर भी बड़े ही सोच की बात है कि मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी। अभी तक बहुतों को यही ज्ञात है कि दिल्ली,लखनऊ की बादशाहत कायम है। यारो, वे दिन गए। अब आलस, हठधरमी यह सब छोड़ो। चलो हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो एक-एक-दो होंगे। पुरानी बातें दूर करो। मीर हसन और इंदरसभा पढ़ा कर छोटेपन ही से लड़कों का सत्यानाश मत करो। होश संभाला नहीं कि पढ़ी पारसी, चुस्त कपड़ा पहनना और गजल गुनगुनाए -

"शौक तिल्फी से मुझे गुल की जो दीदार का था।
न किया हमने गुलिस्ताँ का सबक याद कभी॥"

भला सोचो कि इस हालत में बड़े होने पर वे लड़के क्यों न बिगड़ेंगे। अपने लड़कों को ऐसी किताबें छूने भी मत दो। अच्छी से अच्छी उनको तालीम दो। पैंशन और वजीफे या नौकरी का भरोसा छोड़ो। लड़कों को रोजगार सिखलाओ। विलायत भेजो। छोटेपन से मेहनत करने की आदत दिलाओ। सौ-सौ महलों के लाड़-प्यार, दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ।

भाई हिंदुओं, तुम भी मतमतांतरों का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जप करो। जो हिंदुस्तान में रहे चाहे किसी जाति, किसी रंग का क्यों न हो वह हिंदू है। हिंदू की सहायता करो। बंगाली, मरट्ठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमानों सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिससे तुम्हारे यहाँ बढ़े तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहे वह करो। देखा जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली है वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंग्लैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती है। दीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है। जरा अपने ही को देखो। तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बनी है। जिस लकलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंग्लैंड का है। फरांसीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तुम्हारे सामने जल रही है। यह तो वही मसल हुई एक बेफिकरे मंगती का कपड़ा पहिन कर किसी महफिल में गए। कपड़े को पहिचान कर एक ने कहा - अजी अंगा तो फलाने का हे, दूसरा बोला अजी टोपी भी फलाने की है तो उन्होंने हँस कर जवाब दिया कि घर की तो मूछें ही मूछें हैं। हाय अफसोस तुम ऐसे हो गए कि अपने निज की काम के वस्तु भी नहीं बना सकते। भइयों अब तो नींद से जागो। अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो। वैसे ही खेल खेलो। वैसा बातचीत करो। परदेसी वस्तु और परदेसी भाषा का भरोसा मत रखो अपने में अपनी भाषा में उन्नति करो।

- भारतेंदु हरिश्चंद्र

[बलिया में ददरी के मेले के समय अर्य देशोपकारिणी सभा में दिया गया भाषण]


Aaj Bade Aanand Ka Din Hai Ki Chhote Se Nagar Baliya Mein Ham Itane Manushyon Ko Ek Bade Utsaah Se Ek Sthaan Par Dekhate Hain. Is Abhaage Aalasee Desh Mein Jo Kuchh Ho Jae Vahee Bahut Hai. Banaaras Aise-aise Bade Nagaron Mein Jab Kuchh Nahin Hota to Ham Yah Na Kahenge Ki Baliya Mein Jo Kuchh Hamane Dekha Vah Bahut Hee Prashansa Ke Yogy Hai. Is Utsaah Ka Mool Kaaran Jo Hamane Khoja to Pragat Ho Gaya Ki is Desh Ke Bhaagy Se Aajakal Yahaan Saara Samaaj Hee Ekatr Hai. Raabart Saahab Bahaadur Aise Kalektar Jahaan Ho Vahaan Kyon Na Aisa Samaaj Ho. Jis Desh Aur Kaal Mein Eeshvar Ne Akabar Ko Utpann Kiya Tha Usee Mein Abulaphajal, Beerabal,todaramal Ko Bhee Utpann Kiya. Yahaan Raabart Saahab Akabar Hain Jo Munshee Chaturbhuj Sahaay, Munshee Bihaareelaal Saahab Aadi Abulaphajal Aur Todaramal Hain. Hamaare Hindustaanee Log to Rel Kee Gaadee Hai. Yadyapi Pharst Klaas, Saikend Klaas Aadi Gaadee Bahut Achchhee-achchhee Aur Bade-bade Mahasool Kee is Tren Mein Lagee Hai Par Bina Injin Sab Nahin Chal Sakatee Vaisee Hee Hindustaanee Logon Ko Koee Chalaane Vaala Ho to Ye Kya Nahin Kar Sakate. Inase Itana Kah Deejie Ka Chup Saadhi Raha Balavaana Phir Dekhie Hanumaanajee Ko Apana Bal Kaisa Yaad Aata Hai. So Bal Kaun Yaad Dilaave. Hindustaanee Raaje-mahaaraaje, Navaab, Raees Ya Haakim. Raaje-mahaaraajon Ko Apanee Pooja, Bhojan, Jhoothee Gap Se Chhuttee Nahin. Haakimon Ko Kuchh to Sarakaaree Kaam Ghere Rahata Hai Kuchh Baal-ghudadaud, Thiyetar Mein Samay Laga. Kuchh Samay Bacha Bhee to Unako Kya Garah Hai Ki Ham Gareeb, Gande, Kaale Aadamiyon Se Mil Kar Apana Anamol Samay Khoven. Bas Yahee Masal Rahee -

"Tumhen Gairon Se Kab Phurasat, Ham Apane Gam Se Kab Khaalee.

Chalo Bas Ho Chuka Milana Na Ham Khaalee Na Tum Khaalee."

Teen Mendhak Ek Ke Oopar Ek Baithe the. Oopar Vaale Ne Kaha, Jauk Shauk, Beech Vaal Bola, Gam Sam,sab Ke Neeche Vaala Pukaara, Gae Ham. So Hindustaan Kee Praja Kee Dasha Yahee Hai Gae Ham. Pahale Bhee Jab Aary Log Hindustaan Mein Aakar Base the Raaja Aur Braahmanon Ke Jimme Yah Kaam Tha Ki Desh Mein Naana Prakaar Kee Vidya Aur Neeti Phailaaven Aur Ab Bhee Ye Log Chaahen to Hindustaan Pratidin Kya Pratichhin Badhe. Par Inheen Logon Ko Nikammepan Ne Gher Rakha Hai. Boddhaaro Matsaragrastaah Prabhavah Samar Dooshitaah Ham Nahin Samajhate Ki Inako Laaj Bhee Kyon Nahin Aatee Ki Us Samay Mein Jabaki Inake Purukhon Ke Paas Koee Bhee Saamaan Nahin Tha Tab Un Logon Ne Jangal Mein Patte Aur Mittee Kee Kutiyon Mein Baith Kar Baans Kee Naaliyon Se Jo Taara, Grah Aadi Bedh Kar Ke Unakee Gati Likhee Hai Vah Aisee Theek Hai Ki Solah Laakh Rupe Kee Laagat Se Vilaayat Mein Jo Doorabeen Banee Hai Unase Un Grahon Ko Vedh Karane Mein Bhee Theek Vahee Gati Aatee Hai Aur Ab Aaj is Kaal Mein Ham Logon Kee Angrejee Vidya Ke Aur Janata Kee Unnati Se Laakhon Pustaken Aur Hajaaron Yantr Taiyaar Hain Jab Ham Log Niree Chungee Kee Katavaar Phenkane Kee Gaadee Ban Rahe Hain. Yah Samay Aisa Hai Ki Unnati Kee Maano Ghudadaud Ho Rahee Hai. Amerikan, ‍‍angrej, Pharaansees Aadi Turakee-taajee Sab Sarapatt Daude Jaate Hain. Sab Ke Jee Mein Yahee Hai Ki Paala Hamee Pahale Chhoo Len. Us Samay Hindoo Ka Tiyaavaadee Khaalee Khade-khade Taap Se Mittee Khodate Hain. Inako Auron Ko Jaane Deejie Jaapaanee Tattuon Ko Haanphate Hue Daudate Dekh Kar Ke Bhee Laaj Nahin Aatee. Yah Samay Aisa Hai Ki Jo Peechhe Rah Jaega Phir Koti Upaay Kie Bhee Aage Na Badh Sakega. Loot Kee is Barasaat Mein Bhee Jis Ke Sir Par Kambakhtee Ka Chhaata Aur Aankhon Mein Moorkhata Kee Pattee Bandhee Rahe Un Par Eeshvar Ka Kop Hee Kahana Chaahie.

Mujhako Mere Mitron Ne Kaha Tha Ki Tum is Vishay Par Aaj Kuchh Kaho Ki Hindustaan Kee Kaise Unnati Ho Sakatee Hai. Bhala is Vishay Par Main Aur Kya Kahoon Bhaagavat Mein Ek Shlok Hai - "Nrdehamaadyan Sulabhan Sudurlabhan Plavan Sukalpan Gurukarnadhaaran Mayaasnukoolen Tapah Svateritan Pumaan Bhavaabdhi Na Taret Sa Aatmaha." Bhagavaan Kahate Hain Ki Pahale to Manushy Janm Hee Durlabh Hai So Mila Aur Us Par Guru Kee Krpa Aur Us Par Meree Anukoolata. Itana Saamaan Paakar Bhee Manushy is Sansaar Saagar Ke Paar Na Jae Usako Aatmahatyaara Kahana Chaahie, Vahee Dasha is Samay Hindustaan Kee Hai. Angrejon Ke Raajy Mein Sab Prakaar Ka Saamaan Paakar, Avasar Pa Kar Bhee Ham Log Jo is Samay Unnati Na Karen to Hamaare Keval Abhaagy Aur Parameshvar Ka Kop Hee Hai. Saas Aur Anumodan Se Ekaant Raat Mein Soone Rang Mahal Mein Jaakar Bhee Bahut Dinon Se Praan Se Pyaare Paradesee Pati Se Mil Kar Chhaatee Thandee Karane Kee Ichchha Bhee Usaka Laaj Se Munh Bhee Na Dekhe Aur Bole Bhee Na to Usaka Abhaagy Hee Hai. Vah to Kal Parades Chala Jaega. Vaise Hee Angrejon Ke Raajy Mein Bhee Jo Ham Mendhak, Kaath Ke Ulloo, Pinjade Ke Gangaaraam Hee Rahen to Phir Hamaaree Kamabakht Kamabakhtee Phir Kamabakhtee Hee Hai. Bahut Log Yah Kahenge Ki Hamako Pet Ke Dhandhe Ke Maare Chhuttee Hee Nahin Rahatee, Baaba, Ham Kya Unnati Karen. Tumhaara Pet Bhara Hai Tum Ko Doon Kee Soojhatee Hai. Usane Ek Haath Se Apana Pet Bhara Doosare Haath Se Unnati Ke Kaanton Ko Saaph Kiya. Kya Inglaind Mein Kisaan, Khet Vaale, Gaadeevaan, Majadoor, Kochavaan Aadi Nahin Hain? Kisee Desh Mein Bhee Sabhee Pet Bhare Hue Nahin Hote, Kintu Ve Log Jahaan Khet Jotate-baate Hain Vaheen Usake Saath Yah Bhee Sochate Hain Ki Aisee Kaun Naee Kal Va Masaala Banaaven Jisase is Khet Mein Aage Se Doon Anaaj Upaje. Vilaayat Mein Gaadee Ke Kochavaan Bhee Akhabaar Padhate Hain. Jab Maalik Utarakar Kisee Dost Ke Yahaan Gaya Usee Samay Kochavaan Ne Gaddee Ke Neeche Se Akhabaar Nikaala. Yahaan Utanee Der Kochavaan Hukka Piega Ya Gapp Karega. So Gapp Bhee Nikammee. Vahaan Ke Log Gapp Hee Mein Desh Ke Prabandh Chhaantate Hain. Siddhaant Yah Ki Vahaan Ke Logon Ka Yah Siddhaant Hai Ki Ek Chhin Bhee Vyarth Na Jae. Usake Badale Yahaan Ke Logon Ko Jitana Nikammaapan Ho Utana Hee Bada Ameer Samajha Jaata Hai. Aalasy Yahaan Itanee Badh Gaee Ki Malookadaas Ne Doha Hee Bana Daala -

"Ajagar Kare Na Chaakaree Panchhee Kare Na Kaam.

Daas Malooka Kahi Gae Sabake Daata Raam."



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लड़की को इम्प्रेस कैसे करे | How to impress a girl?

July 16, 2020

एक इंसान के रूप में, जरा सोचिए आपको क्या प्रभावित करेगा!

नहीं, मैं यहाँ मर्दाना इच्छाओं के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ। वह भी एक इंसान है इसलिए उसके अनुसार व्यवहार करें।

  1. अपने इरादे साफ रखें। शरीर मन है यार। यदि आपके पास सिर्फ उसके पैंट के अंदर जाने का इरादा है, तो मुझ पर विश्वास करें, वह कुछ ही समय में यह नोटिस करेगी।
  2. उसे एक रानी की तरह महसूस करो। किसी अवसर की प्रतीक्षा न करें, बस जब भी संभव हो, उसे विशेष महसूस कराएं। लड़कियों का दिल बहुत कोमल होता है और उन्हें ऐसा महसूस होता है कि वह तुरंत पिघल जाती हैं।
  3. उसके "आरामदायक कोने" बनें। हां, हर लड़की को एक ऐसे लड़के की जरूरत होती है, जिसके साथ वह सहज महसूस करती हो।
  4. उसे सुने। हम लोगों के विपरीत, लड़कियां बहुत अधिक भावुक होती हैं। उन्हें हर हाल में किसी को सुनने की जरूरत है। इसलिए, उसे अपने दिल की बात कहने दीजिए।
  5. उसे सम्मान दें। रेंगना मत बेवकूफों की तरह घूरने से उसे तुरंत गुस्सा आ जाएगा।
  6. उसके पास मत जाओ! यह दुनिया यौन शिकारियों से भरी है इसलिए शुद्ध दिल वाला कोई हो। उसे पहला कदम रखने दें। यदि वह आप में रुचि रखती है, तो वह निश्चित रूप से एक कदम आगे बढ़ेगी।
  7. हास्यास्पद रहो। यह एक बिना दिमाग वाला है। लड़कियों को अच्छी समझ वाले लड़के पसंद आते हैं। लेकिन सुनिश्चित करें कि आप इसे अति नहीं करते हैं और # 5 नियम तोड़ते हैं।
  8. अपने शरीर की तुलना में अपने सिर में निवेश करें। इंटेलिजेंस दुनिया को चलता है। कुछ कौशल सीखें। खुद को हर संभव संभव जागरूक करें। अपने सीखने के चैनल खोलें।
  9. क्लास ओवर स्वैग। एक आदमी की तरह पोशाक। खुद को साफ-सुथरा और सही ढंग से तैयार रखें। अच्छा डियोड्रेंट या कोलोन पहनें।
  10. थोड़ा आत्मविश्वास रखें। आत्मविश्वास एक ऐसा गुण है जो धीरे-धीरे आता है, तुरन्त नहीं। आपको बहुत अभ्यास करना होगा और अपनी अवधारणाओं को स्पष्ट करना होगा। यह न केवल वहां की लड़कियों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि अच्छा आत्मविश्वास आपको एक सफल कैरियर भी दिला सकता है।
  11. खुद को फिट रखें। कोई भी व्यक्ति ऐसे व्यक्ति से प्यार नहीं करता है, जिसके पास किसी क्लिनिक या अस्पताल की प्रीमियम सदस्यता हो (सिर्फ मजाक कर रहा हो)। मैं यहां फिटनेस की बात कर रहा हूं, बॉडीबिल्डिंग की नहीं। फिटनेस एक जरूरी है। अच्छा खाएं, कसरत करें और ध्यान लगाएं।
  12. डींग न मारें हर कोई प्राकृतिक बात और डींग मारने के बीच अंतर देख सकता है। कोई भी आपकी कहानियों में दिलचस्पी नहीं रखता है जहां आप हमेशा नायक होते हैं। इसलिए वास्तविक बनो।
  13. मानसिक शक्ति। छोटे सामान पर मानसिक विराम नहीं होता है। चीजों को स्वीकार करना सीखें। धरोहर के बदले चीजों को ठीक करने का काम। एक आदमी के रूप में, रोना ठीक है, लेकिन रोना नहीं है।
  14. अपनी आक्रामकता पर नियंत्रण रखें। मैं भी एक लड़का हूं। मैं समझता हूं कि हमारे पास सभी मुद्दे हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए कि आप किसी पर अपनी सारी आक्रामकता नहीं निकाल सकते। इसके बजाय, अपनी आक्रामकता को जिमिंग जैसी किसी लाभदायक चीज़ में बदलना सीखें।
  15. भरोसेमंद बनो। किसी के लिए वह किसी भी चीज़ पर निर्भर हो सकता है। बहाने मत दो। अपने वादे हमेशा निभाए।
  16. बाते कम काम ज्यादा। केवल यह कहने के बजाय कि "मैं ऐसा करने वाला हूं और वह एक दिन", बस करो, यार। अभिनय शब्दों की तुलना में जोर से बोलते हैं, हमेशा इसे ध्यान में रखें।
  17. सकारात्मकता का स्रोत बनें। सोशल मीडिया पर दुखद पोस्ट न करें जो यह दर्शाता है कि आपका जीवन कितना दुखी है। इसके बजाय, इतना सकारात्मक और आशावादी बनें जो उसे अपनी ओर आकर्षित करे।
  18. करिश्माई बनें। तो करिश्मा कोई मिथक नहीं है। किसी के साथ ऐसा व्यवहार करें कि कमरे में प्रवेश करते ही हर कोई आपसे बात करना चाहे। आपकी बॉडी लैंग्वेज, आपकी बुद्धिमत्ता, आपकी समझदारी, आपका सर्द स्तर, सामान संभालने की आपकी क्षमता, आपकी निर्णय लेने की शक्ति आदि सब कुछ एक आकर्षक करिश्मे में गिना जाता है।
  19. सर्वश्रेष्ठ बनो! आप कुछ भी हासिल करने से महज एक मानसिकता हैं। लड़कियों को ऐसे लोग पसंद होते हैं जो हर उस चीज में अच्छे होते हैं जो वे इस पर काम करती हैं।
  20. एक लक्ष्य है! एक भेड़ मत बनो और भीड़ का पालन करें। एक लक्ष्य है। इस पर रोजाना काम करें। अपने करियर पर ध्यान दें। बड़ी तस्वीर के बारे में सोचो।
  21. धूम्रपान न करें! मैंने कभी भी किसी भी लड़की को नहीं देखा जो धूम्रपान की आदत के साथ अपने साथी के साथ ठीक है।
  22. सभी को एक साथ रखने के लिए जानें। उसे "मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगा" पाठ और इस तरह से अन्य cringey सामान नहीं। यह गंभीरता से आश्वस्त नहीं है। आप ऐसा करके उसे और भी अधिक दोहरा रहे हैं।

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सचिन पायलट द्वारा बनाए गए हंगामे में भाजपा की क्या भूमिका है? | What is the role of the BJP in the ruckus created by Sachin Pilot?

July 14, 2020

"बीजेपी के पास राजस्थान में कांग्रेस के संकट से कोई लेना-देना नहीं है, अगर किसी को भी गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है तो वह है कांग्रेस।"

मैं सबूत के विभिन्न टुकड़ों के साथ अपने बयान का समर्थन कर रहा हूँ।

कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है जिसे पार्टी के मेहनती सदस्यों के बजाय वफादार ' का समर्थन करने के लिए जाना जाता है । इसने जमीनी स्तर के पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा किया है और कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी पैदा की है।

  • ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बदसलूकी की

सिंधिया 2001 में कांग्रेस में शामिल हुए और जीत हासिल की थी लगातार तीन 2004, 2009 और 2014 वह के रूप में सेवा में गुना से लोकसभा चुनाव राज्य मंत्री के तहत यूपीए सरकार में वाणिज्य और उद्योग पोर्टफोलियो और सत्ता के लिए राज्य के मंत्री के बाद 2012 मंत्रिमंडल फेरबदल।

शिवराज सिंह के भाजपा के खिलाफ 2018 के मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव के अभियान का नेतृत्व करने के लिए सिंधिया को एक कठिन काम दिया गया था । उन्होंने चुनौती ली और कड़ी मेहनत से कांग्रेस की ओर रुख बदलने में सफल रहे 

दुर्भाग्य से, उन्हें उनकी कड़ी मेहनत के लिए सम्मानित नहीं किया गया , बल्कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह द्वारा दरकिनार कर दिया गया 

उन्हें कभी कांग्रेस द्वारा सीएम उम्मीदवार के रूप में भी नहीं माना गया था और उन्हें पीसीसी की कुर्सी से भी मना कर दिया गया था । अगले वर्ष वह खो लोकसभा चुनाव में और भी था प्रदर्शन के साथ उखड़ राज्य में कांग्रेस के।

इससे कांग्रेस पार्टी में निराशा और उसका अविश्वास पैदा हो गया और वह आखिरकार 11 मार्च, 2020 को भाजपा में शामिल हो गया 

क्या इसमें भाजपा की कोई भूमिका थी? नहीं!

  • कांग्रेस सचिन पायलट के साथ एक ही सुइट का अनुसरण करती है।

कांग्रेस के दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद गहलोत के साथ समस्या शुरू हो गई और पायलट के बजाय, जिन्होंने पार्टी को जीत की ओर अग्रसर किया , कांग्रेस ने गहलोत को सीएम पद के लिए चुना । बहुत अनुनय के बाद, पायलट डिप्टी सीएम पद और कुछ महत्वपूर्ण विभागों के लिए बस गए। तब से, दोनों ने एक दूसरे का नाम लिए बिना, सूक्ष्म तरीके से एक-दूसरे पर निशाना साधा है।

पायलट को कांग्रेस कमेटी द्वारा दरकिनार कर दिया गया है और हाल के नौकरशाही फेरबदल में, उन्हें अपनी पसंद के अधिकारियों को चुनने की भी अनुमति नहीं दी गई और उनके विभाग में नियुक्त अधिकारियों ने पायलट के साथ मतभेद साझा किए। पायलट और गहलोत अब लंबे समय से लॉगरहेड्स में हैं और बहुत बढ़ जाने के बाद, यहां तक ​​कि पायलट ने तंग आकर बदलाव की मांग की।

कपिल सिब्बल ने हाल के एक ट्वीट में अपनी चिंता व्यक्त की और कांग्रेस को अपने हाथों से बाहर जाने से पहले गंभीर बदलाव करने पर जोर दिया।

चित्र सौजन्य : कपिल सिब्बल ट्विटर अकाउंट

निष्कर्ष: यह कांग्रेस पार्टी है जो हंगामे के लिए खुद जिम्मेदार है जो पक्षपात और वंशवादी राजनीति की अपनी पुरानी प्रथाओं में निहित है । यह उच्च समय है कि यह गंभीर सुधार करता है और वफादार लोगों का पक्ष लेने के बजाय उनकी योग्यता के आधार पर लोगों को बढ़ावा देता है।

संपादित करें (14/07/2020): सचिन पायलट ने डिप्टी सीएम के साथ ही राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया। मुझे कांग्रेस से यही उम्मीद थी। उन्होंने एक और मणि को जाने दिया जो भविष्य में पार्टी के लिए चमत्कार कर सकता था। 2018 के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस के जीतने के पीछे सचिन पायलट प्रमुख कारण थे। इसने बहुत बुरी मिसाल कायम की है और इससे कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी बढ़ सकती है।

जय हिंद!

पढ़ने के लिए धन्यवाद।

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