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दंगों पर कविता ~ हिन्दी कविता | Hindi Poem on Riots

January 21, 2023

दंगों पर कविता 

दंगों में दंगाई कहाँ मरते है
मरता है सब्जीवाला,रेड़ीवाला इंसान
मरता है बेघर वाला इंसान

दंगाई भाग जाते है
मासूम के घरों में लगाकर आग
धीरे-धीरे वो आग तो बुझ जाती है
पर दिल में सुलगती रहती है
वहीं आग फिर दंगा कराती है
ऐसे ही दंगों की फसल लहलहाती है

दंगों में दंगाई नहीं लुटे जाते है
लुटे जाते है गरीब मजदूर किसान
दंगाई लुट ले जाते है
इनके घरों की आबरू व सारा सामान
और छोड़ जाते है भुखमरी व विलाप
धीरे-धीरे भुखमरी तो ख़त्म हो जाती है
पर कभी नहीं जाती है विलाप
वहीं विलाप फिर दंगा कराती है
ऐसे ही दंगों की फसल लहलहाती है

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